आरंभिक नगर (2)


फ़ेकॅन्स पत्थर और शंख प्राकृतिक तौर पर पाए जाते हैं , लेकिन फ़ेयन्स को कृत्रिम रूप से तैयार किया जाता है । बालू या स्फटिक पत्थरों के चूर्ण को गोंद में मिलाकर उनसे वस्तुएँ बनाई जाती थीं । उसके बाद उन वस्तुओं पर एक चिकनी परत चढ़ाई जाती थी । इस चिकनी परत के रंग प्राय : नीले या हल्के समुद्री हरे होते थे । फ़ेयन्स से मनके , चूड़ियाँ , बाले और छोटे बर्तन बनाए जाते थे ।

कच्चे माल की खोज में 

कच्चा माल उन पदार्थो को कहते हैं जो या तो प्राकृतिक रूप से मिलते हैं या फिर किसान या पशुपालक उनका उत्पादन करते हैं जैसे लकड़ी या धातुओं के अयस्क प्राकृतिक रूप से उपलब्ध कच्चे माल हैं । इनसे फिर कई तरह की चीजें बनाई जाती हैं । मिसाल के तौर पर किसानों द्वारा पैदा किए गए कपास को कच्चा माल कहते हैं , जिससे बाद में कताई - बुनाई करके कपड़ा तैयार किया जाता है । हड़प्पा में लोगों को कई चीजें वहीं मिलती थीं , लेकिन ताँबा , लोहा , सोना , चाँदी और बहुमूल्य पत्थरों जैसे पदार्थों का वे दूर - दूर से आयात करते थे । हड़प्पा के लोग ताँबे का आयात सम्भवतः आज के राजस्थान से करते थे । यहाँ तक कि पश्चिम एशियाई देश ओमान से भी ताँबे का आयात किया जाता था । काँसा बनाने के लिए तांबे के साथ मिलाई जाने वाली धातु टिन का आयात आधुनिक ईरान और अफ़गानिस्तान से किया जाता था । सोने का आयात आधुनिक कर्नाटक और बहुमूल्य पत्थर का आयात गुजरात , ईरान और अफ़गानिस्तान से किया जाता था ।

चीजों को एक जगह से दूसरी जगह कैसे ले जाया जाता था ? इन चित्रों को देखो । एक खिलौना है , और दूसरी एक मुहर । क्या तुम बता सकते हो , कि हड़प्पा के लोग यातायात के लिए किन साधनों का प्रयोग करते थे ? पिछले अध्यायों में क्या तुमको पहिए वाले वाहनों की जानकारी दी गई है । । बच्चों का खिलौना हल । आज हल चलाने वाले ज़्यादातर किसान पुरुष होते हैं । हमें ज्ञात नहीं है कि क्या हड़प्पा में भी यही प्रथा थी ।

नगरों में रहने वालों के लिए भोजन

 लोग नगरों के अलावा गाँवों में भी रहते थे । वे अनाज उगाते थे और जानवर पालते थे । किसान और चरवाहे ही शहरों में रहने वाले शासकों , लेखकों और दस्तकारों को खाने के सामान देते थे । पौधों के अवशेषों से पता चलता है कि हड़प्पा के लोग गेहूँ , जौ , दालें , मटर , धान , तिल और सरसों उगाते थे । ज़मीन की जुताई के लिए हल का प्रयोग एक नई बात थी । हड़प्पा काल के हल तो नहीं बच पाए है , क्योंकि वे प्रायः लकड़ी से बनाए जाते थे , लेकिन हल के आकार के खिलौने मिले हैं । इस क्षेत्र में बारिश कम होती है , इसलिए सिंचाई के लिए लोगों ने कुछ तरीके अपनाए होंगे । संभवतः पानी का संचय किया जाता होगा और जरूरत पड़ने पर उससे फ़सलों की सिंचाई की जाती होगी । हड़प्पा के लोग गाय , भैंस , भेड़ और बकरियाँ पालते थे । बस्तियों के आस - पास तालाब और चारागाह होते थे । लेकिन सूखे महीनों में मवेशियों के झुंडों को चारा - पानी की तलाश में दूर - दूर तक ले जाया जाता था । वे बेर जैसे फलों को इकट्ठा करते थे , मछलियाँ पकड़ते थे . और हिरण जैसे जानवरों का शिकार भी करते थे ।

 गुजरात में हड़प्पाकालीन नगर का सूक्ष्म - निरीक्षण

 कच्छ के इलाके में खदिर बेत के किनारे धौलावीरा नगर बसा था । वहीं साफ़ पानी मिलता था और जमीन उपजाऊ थी । जहाँ हड़प्पा सभ्यता के कई नगर दो भागों में विभक्त थे वहीं धौलावीरा नगर को तीन भागों में बाँटा गया था । इसके हर हिस्से के चारों ओर पत्थर की ऊँची - ऊँची दीवार बनाई गई थी । इसके अंदर जाने के लिए बड़े बड़े प्रवेश - द्वार थे । इस नगर में एक खुला मैदान भी था , जहाँ सार्वजनिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे । यहाँ मिले कुछ अवशेषों में हड़प्पा लिपि के बड़े - बड़े अक्षरों को पत्थरों में खुदा पाया गया है । इन अभिलेखों को संभवत : लकड़ी में जड़ा गया था । यह एक अनोखा अवशेष है , क्योंकि आमतौर पर हड़प्पा के लेख मुहर जैसी छोटी वस्तुओं पर पाए जाते हैं । गुजरात की खम्भात की खाड़ी में मिलने वाली साबरमती की एक उपनदी के किनारे बसा लोथल नगर ऐसे स्थान पर बसा था , जहाँ कीमती पत्थर जैसा कच्चा माल आसानी से मिल जाता था । यह पत्थरों , शंखों और धातुओं से बनाई गई चीजों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था । इस नगर में एक भंडार गृह भी था । इस भंडार गृह से कई मुहरें और मुद्रांकन या मुहरबंदी ( गीली मिट्टी पर दबाने से बनी उनकी छाप ) मिले हैं ।
   
              लोथल का बन्दरगाह । यह बड़ा तालाब लोथल का बन्दरगाह रहा होगा , जहाँ समुद्र के रास्ते आने वाली नावें रुकती थीं । संभवत : यहाँ पर माल चढ़ाया - उतारा जाता होगा ।


यहाँ पर एक इमारत मिली है , जहाँ संभवतः मनके बनाने का काम होता था । पत्थर के टुकड़े , अधबने मनके , मनके बनाने वाले उपकरण और तैयार मनके भी यहाँ मिले हैं ।

मुद्रा ( मुहर ) और मुद्राकन या मुहरबंदि 

 मुहरों का प्रयोग सामान से भरे उन डिब्बों या थैलों को चिह्नित करने के लिए किया जाता होगा , जिन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेजा जाता था । थैले को बंद करने के बाद उनके मुहानों पर गीली मिट्टी पोत कर उन पर मुहर लगाई जाती थी । मुहर की छाप को मुहरबन्दी कहते हैं । अगर यह छाप टूटी हुई नहीं होती थी , तो यह साबित हो जाता था , कि सामान के साथ छेड़ - छाड़ नहीं हुई है ।

सभ्यता के अंत का रहस्य

 लगभग 3900 साल पहले एक बड़ा बदलाव देखने को मिलता है । अचानक लोगों ने इन नगरों को छोड़ दिया । लेखन , मुहर और बाटों का प्रयोग बंद हो गया । दूर - दूर से कच्चे माल का आयात काफी कम हो गया । मोहनजोदड़ों में सड़कों पर कचरे के ढेर बनने लगे । जलनिकास प्रणाली नष्ट हो गई और सड़कों पर ही झुग्गीनुमा घर बनाए जाने लगे । यह सब क्यों हुआ ? कुछ पता नहीं । कुछ विद्वानों का कहना है , कि नदियाँ सूख गई थीं । अन्य का कहना है , कि जंगलों का विनाश हो गया था । इसका कारण ये हो सकता है , कि ईंटें पकाने के लिए ईंधन की ज़रूरत पड़ती थी । इसके अलावा मवेशियों के बड़े - बड़े झुंडों से चारागाह और घास वाले गए होंगे । कुछ इलाकों में बाढ़ आ गई । लेकिन इन कारणों से यह स्पष्ट नहीं हो पाता है कि सभी नगरों का अंत कैसे हो गया । क्योंकि बाढ़ और नदियों के सूखने का असर कुछ ही इलाकों में हुआ होगा । ऐसा लगता है , कि शासकों का नियंत्रण समाप्त हो गया । जो भी हुआ हो , परिवर्तन का असर बिल्कुल साफ़ दिखाई देता है । आधुनिक पाकिस्तान के  सिंध और पंजाब की बस्तियाँ उजड़ गई थीं । कई लोग पूर्व और दक्षिण के इलाकों में नई और छोटी बस्तियों में जाकर बस गए । इसके लगभग 1400 साल बाद नए नगरों का विकास हुआ । 

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