परमेश्वर का विचार
बड़े - बड़े राज्यों के उदय होने से पहले , भिन्न - भिन्न समूहों के लोग अपने - अपने देवी - देवताओं की पूजा किया करते थे । जब लोग , नगरों के विकास और व्यापार तथा साम्राज्यों के माध्यम से एक साथ आते गए , तब नए - नए विचार विकसित होने लगे । यह बात व्यापक रूप से स्वीकार की जाने लगी कि सभी जीवधारी अच्छे तथा बुरे कर्म करते हुए जीवन - मरण और पुनर्जीवन के अनंत चक्रों से गुजरते हैं । इसी प्रकार यह विचार भी गहरे बैठ गया था कि सभी व्यक्ति जन्म के समय भी एक बराबर नहीं होते हैं । यह मान्यता कि सामाजिक विशेषाधिकार किसी उच्च परिवार अथवा ऊँची जाति में पैदा होने के कारण मिलते हैं , कई पांडित्यपूर्ण ग्रंथों का विषय था । अनेक लोग ऐसे विचारों के कारण बेचैन थे । इसलिए वे बुद्ध तथा जैनों के उपदेशों की ओर उन्मुख हुए , जिनके अनुसार व्यक्तिगत प्रयासों से सामाजिक अंतरों को दूर किया जा सकता है और पुनर्जन्म के चक्र से छुटकारा पाया जा सकता है । कुछ अन्य लोग परमेश्वर संबंधी इस विचार से आकर्षित हुए कि यदि मनुष्य भक्तिभाव से परमेश्वर की शरण में जाए , तो परमेश्वर , व्यक्ति को इस बंधन से मुक्त कर सकता है । श्रीमद्भगव...