आखेट - खाद्य संग्रह से भोजन उत्पादन तक

◆ आरंभिक मानव : आखिर वे इधर - उधर क्यों घूमते थे ? 

हम उन लोगों के बारे में जानते हैं , जो इस उपमहाद्वीप में बीस लाख साल पहले रहा करते थे । आज हम उन्हें आखेटक - खाद्य संग्राहक के नाम से जानते हैं । भोजन का इंतजाम करने की विधि के आधार पर उन्हें इस नाम से पुकारा जाता है । आमतौर पर खाने के लिए वे जंगली जानवरों का शिकार करते थे , मछलियाँ और चिड़िया पकड़ते थे , फल - मूल , दाने , पौधे - पत्तियाँ , अंडे इकट्ठा किया करते थे । आखेटक - खाद्य संग्राहक समुदाय के लोग एक जगह से दूसरी जगह पर घूमते रहते थे । ऐसा करने के कई कारण थे । पहला कारण यह कि अगर वे एक ही जगह पर ज़्यादा दिनों तक रहते तो आस - पास के पौधों , फलों और जानवरों को खाकर समाप्त कर देते थे । इसलिए और भोजन की तलाश में इन्हें दूसरी जगहों पर जाना पड़ता था । दूसरा कारण यह कि जानवर अपने शिकार के लिए या फिर हिरण और मवेशी अपना चारा ढूँढ़ने के लिए एक जगह से दूसरी जगह जाया करते हैं । इसीलिए , इन जानवरों का शिकार करने वाले लोग भी इनके पीछे - पीछे जाया करते होंगे । तीसरा कारण यह कि पेड़ों और पौधों में फल - फूल अलग - अलग मौसम में आते हैं , इसीलिए लोग उनकी तलाश में उपयुक्त मौसम के अनुसार अन्य इलाकों में घूमते होंगे । और चौथा कारण यह है कि पानी के बिना किसी भी प्राणी या पेड़ - पौध का जीवित रहना संभव नहीं होता और पानो झीलों , झरनों तथा नदियों में ही मिलता है । यद्यपि कई नदियों और झीलों का पानी कभी नहीं सूखता , कुछ झीलों और नदियों में पानी बारिश के बाद ही मिल पाता है । इसीलिए ऐसी झीलों और नदियों के किनारे बसे लोगों को सूखे मौसम में पानी की तलाश में इधर - उधर जाना पड़ता होगा । 
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◆ आरंभिक मानव के बारे में जानकारी कैसे मिलती है ? 

पुरातत्त्वविदों को कुछ ऐसी वस्तुएँ मिली हैं जिनका निर्माण और उपयोग आखेटक - खाद्य संग्राहक किया करते थे । यह संभव है कि लोगों ने अपने काम के लिए पत्थरों , लकड़ियों और हड्डियों के औज़ार बनाए हों । इनमें से पत्थरों के औजार आज भी बचे हैं । इनमें से कुछ औज़ारों का उपयोग फल - फूल काटने , हड्डियाँ और मांस काटने तथा पेड़ों की छाल और जानवरों की खाल उतारने के लिए किया जाता था । कुछ के साथ हड्डियों या लकड़ियों के मुढे लगा कर भाले और बाण जैसे हथियार बनाए जाते थे । कुछ औज़ारों से लकड़ियाँ काटी जाती थीं । लकड़ियों का उपयोग ईंधन के साथ - साथ झोपड़ियाँ और औजार बनाने के लिए भी किया जाता था । 

पत्थर के औज़ारों का उपयोग बाएँ : इंसान के खाने योग्य जड़ों को खोदने के लिए किया जाता था , और दाएँ : जानवरों की खाल से बने वस्त्रों को सिलने के लिए किया जाता था । 
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रहने की जगह निर्धारित करना ?

 लाल त्रिकोण वाले स्थान वे पुरास्थल हैं जहाँ पर आखेटक - खाद्य संग्राहकों के होने के प्रमाण मिले हैं । इनके अलावा भी और कई स्थानों पर आखेटक - खाद्य संग्राहक रहते थे । मानचित्र में सिर्फ कुछ गिने - चुने स्थान ही चिह्नित किए गए हैं । कई पुरास्थल नदियों और झीलों के किनारे पाए गए हैं ।  


चूंकि पत्थर के उपकरण बहुत महत्वपूर्ण थे इसलिए लोग ऐसी जगः ढूँढ़ते रहते थे , जहाँ अच्छे पत्र मिल सकें । शैल चित्रकला : इनसे हमें क्या पता चलता है ? एक शैल चित्र । इस चित्र के बारे में बताओ । जिन गुफाओं में लोग रहते थे , उनमें से कुछ की दीवारों पर चित्र मिले हैं । इनमें कुछ सुन्दर उदाहरण मध्य प्रदेश और दक्षिणी उत्तर प्रदेश की गुफाओं से मिले चित्र हैं । इनमें जंगली जानवरों का बड़ी कुशलता से सजीव चित्रण किया गया है ।
  

भीमबेटका ( आधुनिक मध्य प्रदेश ) इस पुरास्थल पर गुफाएँ व कंदराएँ मिली हैं । लोग इन गुफाओं में इसलिए रहते थे , क्योंकि यहाँ उन्हें बारिश , धूप और हवाओं से राहत मिलती थी । ये गुफाएँ नर्मदा घाटी के पास हैं । क्या तुम बता सकते हो कि रहने के लिए लोगों ने यह जगह क्यों चुनी होगी ?

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                            पुरास्थल
 पुरास्थल उस स्थान को कहते हैं जहाँ औजार , बर्तन और इमारतों जैसी वस्तुओं के अवशेष मिलते हैं । ऐसी वस्तुओं का निर्माण लोगों ने अपने काम के लिए किया था और बाद में वे उन्हें वहीं छोड़ गए । ये ज़मीन के ऊपर , अन्दर , कभी - कभी समुद्र और नदी के तल में भी पाए जाते हैं । इन पुरास्थलों के बारे में आपको अगले अध्यायों में बताया जाएगा ।

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आग की खोज ?

 यहाँ राख के अवशेष मिले हैं । इसका मतलब यह है कि आरंभिक लोग आग जलाना सीख गए थे । आग का इस्तेमाल कई कार्यों के लिए किया गया होगा जैसे कि प्रकाश के लिए , मांस भूनने के लिए और खतरनाक जानवरों को दूर आदि भगाने के लिए ।


नाम और तिथियाँ 

हम जिस काल के बारे में पढ़ रहे हैं , पुरातत्त्वविदों ने उनके बड़े - बड़े नाम रखे हैं । आरंभिक काल को वे पुरापाषाण काल कहते हैं । यह दो शब्दों पुरा यानी ' प्राचीन ' , और पाषाण यानी ' पत्थर ' से बना है । यह नाम पुरास्थलों से प्राप्त पत्थर के औजारों के महत्त्व को बताता है । पुरापाषाण काल बीस लाख साल पहले से 12,000 साल पहले के दौरान माना जाता है । इस काल को भी तीन भागों में विभाजित किया गया है : ' आरंभिक ' , ' मध्य ' एवं ' उत्तर ' पुरापाषाण युग । मानव इतिहास की लगभग 99 प्रतिशत कहानी इसी काल के दौरान घटित हुई । जिस काल में हमें पर्यावरणीय बदलाव मिलते हैं , उसे ' मेसोलिथ ' यानी मध्यपाषाण युग कहते हैं । इसका समय लगभग 12,000 साल पहले से लेकर 10,000 साल पहले तक माना गया है । इस काल के पाषाण औजार आमतौर पर बहुत छोटे होते थे । इन्हें ' माइक्रोलिथ ' यानी लघुपाषाण कहा जाता है । प्राय : इन औजारों में हड्डियों या लकड़ियों के मुढे लगे हसिया और आरी जैसे औजार मिलते थे । साथ - साथ पुरापाषाण युग वाले औजार भी इस दौरान बनाए जाते रहे । अगले युग की शुरुआत लगभग 10,000 साल पहले से होती है । इसे नवपाषाण युग कहा जाता है । नवपाषाण का क्या मतलब होता होगा ? हमने कुछ स्थानों के नाम दिए हैं । अगले अध्यायों में तुम्हें ऐसे अनेक नाम मिलेंगे । अक्सर हम पुराने स्थानों के लिए उन नामों का प्रयोग करते हैं , आज प्रचलित हैं , क्योंकि हमें ज्ञात नहीं है कि उस काल में इनके क्या नाम रहे होंगे ।
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बवलती जलवायु

 लगभग 12.000 साल पहले मुनिया की जलवायु में बड़े बदलाव आए और गर्मी बढ़ने लगी । इसके परिणामस्वरूप कई क्षेत्रों में घास वाले मैदान बना लगे । इससे हिरण , बारहसिंघा , भेड़ , बकरी और गाय जैसे उन जानवरों की संख्या बढ़ी , जो घास खाकर जिन्दा रह सकते हैं । जो लोग इन जानवरों का शिकार करते थे , वे भी इनके पीछे आए और इनके खाने - पीने की आदतों और प्रजनन के समय की जानकारी हासिल करने लगे । हो सकता है कि तब लोग इन जानवरों को पकड़ कर अपनी जरूरत के अनुसार पालने की बात सोचने लगे हों । साथ ही इस काल में मछली भी भोजन का महत्वपूर्ण स्रोत बन गई । 
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खेती और पशुपालन की शुरुआत कैसे हुआ ?

 इसी दौरान उपमहाद्वीप के भिन्न - भिन्न इलाकों में गेहूँ , जौ और धान जैसे अनाज प्राकृतिक रूप से उगने लगे थे । शायद महिलाओं , पुरुषों और बच्ची ने इन अनाजों को भोजन के लिए बटोरना शुरू कर दिया होगा । साथ ही वे यह भी सीखने लगे होंगे कि यह अनाज कहाँ उगते थे और कब पककर तैयार होते थे । ऐसा करते - करते लोगों ने इन अनाजों को करना सीख लिया होगा । इस प्रकार धीरे - धीरे वे कृषक बन गए होंगे । इसी तरह लोगों ने अपने घरों के आस - पास चारा रखकर जानवरों को आकर्षित कर उन्हें पालतू बनाया होगा । सबसे पहले जिस जंगली जानवर को पालतू बनाया गया वह कुत्ते का जंगली पूर्वज था । धीरे - धीरे लोग भेड़ बकरी , गाय और सूअर जैसे जानवरों को अपने घरों के नज़दीक आने को उत्साहित करने लगे । ऐसे जानवर झुण्ड में रहते थे और ज्यादातर घास खाते थे । अक्सर लोग अन्य जंगली जानवरों के आक्रमण से इनकी सुरक्षा किया करते थे और इस तरह धीरे - धीरे वे पशुपालक बन गए होंगे । क्या तुम बता सकती हो कि सबसे पहले कुत्तों को ही पालतू बनाया गया ? 


                    बसने की प्रक्रिया 
 लोगों द्वारा पौधे उगाने और जानवरों की देखभाल करने को ' बसने की प्रक्रिया ' का नाम दिया गया है । अपनाए गए पौधे तथा जानवर अक्सर जंगली पौधों तथा जानवरों से भिन्न होते हैं । इसकी वजह यह है कि बसने की प्रक्रिया की दिशा में अपनाए गए पौधों या जानवरों का लोग चयन करते हैं । के तौर पर लोग उन्हीं पौधों तथा जानवरों का चयन करते हैं जिनके बीमार होने की संभावना कम हो । यही नहीं , लोग उन्हीं पौधों को चुनते हैं जिनसे बड़े दाने वाले अनाज पैदा होते हैं । साथ ही जिनकी मजबूत डंठले अनाज के पके दानों के भार को संभाल सके । ऐसे पौधों के बीजों को संभालकर रखा जाता है ताकि फिर से उगाने के लिए उनके गुण सुरक्षित रह सकें । उन्हीं जानवरों को आगे प्रजनन के लिए चुना मतौर पर अहिंसक होते हैं । इसलिए हम देखते हैं कि पाले गए जानवर तथा कृषि के लिए अपनाए गए पौधे , जंगली जानवरों तथा पौधों से धीरे - धीरे भिन्न होते गए । मिसाल के तौर पर जंगली जानवरों की तुलना में पालतू जानवरों के दाँत और सींग छोटे होते हैं । इन दाँतों को देखो । इनमें से कौन - सा जंगली सूअर का है और कौन - सा पालतू सूअर का ? बसने की प्रक्रिया पूरी दुनिया में धीरे - धीरे चलती रही । यह करीब 12,000 साल पहले शुरू हुई । वास्तव में आज हम जो भोजन करते हैं वो इसी बसने की प्रक्रिया की वजह से है । कृषि के लिए अपनाई गई सबसे प्राचीन फसलों में गेहूँ तथा जौ आते हैं , उसी तरह सबसे पहले पालतू बनाए गए जानवरों में कुत्ते के बाद भेड़ - बकरी आते है। 
एक नवीन जीवन - शैली तुम किसी पौधे के बीज को बो कर देखो , तुम पाओगी कि इसे विकसित होने में कुछ वक्त लगता है । इसमें कुछ दिन , महीने या फिर साल तक लग सकता है । इसलिए जब लोग पौधे उगाने लगे तो उनकी देखभाल के लिए उन्हें एक ही जगह पर लंबे समय तक रहना पड़ा था । बीज बोने से लेकर फ़सलों के पकने तक , पौधों की सिंचाई करने , खरपतवार हटाने , जानवरों और चिड़ियों से उनकी सुरक्षा करने जैसे बहुत - से काम शामिल थे । कटाई के बाद , अनाज का उपयोग बहुत संभाल कर करना पड़ता था । अना को भोजन और बीज , दोनों ही रूपों में बचा कर रखना आवश्यक लए लोगों को इसके भंडारण की बात सोचनी पड़ी । बहुत - से इलाकों में लोगों में मिट्टी के बड़े - बड़े बर्तन बनाए , टोकरियाँ बुनों का फिर जमीन में गड्ढा खोदा ।

जानवर :

 चलते - फिरते ' खाद्य - भंडार '

 जानवर बच्चे देते हैं जिससे उनकी संख्या बढ़ती है । अगर जानवरों की देखभाल की जाए तो उनकी संख्या तो बढ़ती ही है साथ ही उनसे दूध भी प्राप्त हो सकता है जो भोजन का एक अच्छा स्रोत है । यही नहीं जानवरों से हमें मांस भी मिलता है । दूसरे शब्दों में , पशु - पालन भोजन के भंडारण ' का एक तरीका है । भोजन के अतिरिक्त जानवरों से और क्या - क्या मिल सकता है ? आज जानवरों का उपयोग किस लिए होता है ? 

आओ , आरंभिक कृषकों और पशुपालकों के बारे में पता करें ? 

 क्या तुम्हें कई नीले वर्ग दिख रहे हैं ? पता है . इनमें से प्रत्येक बिंदु उस जगह को दर्शाता है , जहाँ पुरातत्त्वविदों को शुरुआती कृषकों और पशुपालकों के होने के साक्ष्य मिले हैं । ये पूरे उपमहाद्वीप में पाए गए हैं । इनमें सबसे महत्वपूर्ण पश्चिमोत्तर क्षेत्र में , आधुनिक कश्मीर में , और पूर्वी तथा दक्षिण भारत में पाए गए हैं । वास्तव में ये निर्दिष्ट स्थान कृषकों और पशुपालकों की बस्तियाँ थीं या नहीं , इसे जाँचने के लिए वैज्ञानिक खुदाई में मिले पौधों और पशुओं की हड़ियों के नमूनों का अध्ययन करते हैं । इनमें से सबसे रोचक जले हुए अनाज के दानों के अवशेष हैं । ऐसा लगता है कि ये गलती से या फिर जानबूझ कर जलाए गए होंगे । वैज्ञानिक इन अनाज के दानों की पहचान कर सकते है । इस तरह हम पता चलता है कि इस उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में सारी फसलें उगाई जाती रही होंगी । वैज्ञानिक विभिन्न जानवरों को हट्टियों की भी पहचा . , कर सकते हैं ।
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स्थायी जीवन की ओर

 पुरातत्त्वविदों को कुछ पुरास्थलों पर झोपड़ियों और घरों के निशान मिले है । जैसे कि बुर्जहोम ( वर्तमान कश्मीर में ) के लोग गड्डे के नीचे घर बनाते थे जिन्हें गतवास कहा जाता है । इनमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ होती थीं । इससे उन्हें ठंड के मौसम में सुरक्षा मिलती होगी । पुरातत्त्वविदों को झोपड़ियों के अंदर और बाहर दोनों ही स्थानों पर आग जलाने की जगहें मिली हैं । ऐसा लगता है कि लोग मौसम के अनुसार घर के अंदर या बाहर खाना पकाते होंगे । एक गर्तवास का चित्र बनाओ । बहुत सारी जगहों से पत्थर के औजार भी मिले हैं । इनमें से कई ऐसे हैं , जो पुरापाषाणयुगीन उपकरणों से भिन्न हैं । इसीलिए इन्हें नवपाषाण युग का माना गया है । इनमें वे औजार भी हैं , जिनकी धार को और अधिक पैना करने के लिए उन पर पॉलिश चढ़ाई जाती थी । ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज तथा वनस्पतियों से प्राप्त अन्य चीजों को पीसने के लिए किया जाता था । आज हजारों साल बाद भी ओखली और मूसल का प्रयोग अनाज पीसने के लिए किया जाता है । उसी तरह प्राचीन प्रस्तरयुगीन औजारों का निर्माण और प्रयोग लगातार होता रहा । कुछ औजार हड्डियों से भी बनाए जाते थे । नवपाषाण युग के पुरास्थलों से कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन मिले हैं । कभी - कभी इन पर अलंकरण भी किया जाता था । बर्तनों का उपयोग चीज को रखने के लिए किया जाता था । धीरे - धीरे लोग बर्तनों का प्रयोग खान बनाने के लिए भी करने लगे । चावल , गेहूँ तथा दलहन जैसे अनाव अब आहार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे । इसके साथ - साथ अब लोग कपड़े भी बुनने लगे थे । इसके लिए कपास जैसे आवश्यक पौधे उगाएको सकते थे । क्या ये परिवर्तन हर जगह एक साथ ही आ गए होंगे ? ऐसी बात नहीं है । एक तरफ़ जहाँ कई जगहों पर स्त्री - पुरुष शिकार और भोजन - संग्रह कर का काम करते रहे थे वहीं अन्य लोगों ने हजारों सालों के दरम्यान धीरे - धीरे खेती और पशुपालन को अपना लिया । बहुत जगह लोग मौसम के मुताबिक बदल - बदल कर अपनी जीविका चलाया करते थे


यह ईरान जाने वाले सबस महत्वपूर्ण रास्ते , बोलन दरें के पास एक हराभरा समतल स्थान है । मेहरगद संभवतः वह स्थान है , जहाँ के स्त्री - पुरुषों ने , इस इलाके में सबसे पहले जौ , गेहूँ उगाना और भेड़ - बकरी पालना सीखा । यहाँ विभिन्न प्रकार के जानवरों की हड्डियाँ मिलीं । इनमें हिरण तथा सूअर जैसे जंगली जानवरों तथा भेड़ और बकरियों की हड्डियाँ हैं । महरगढ़ में इसके अलावा चौकोर तथा आयताकार घरों के अवशेष भी मिले हैं । प्रत्येक घर में चार या उससे ज्यादा कमरे हैं , जिनमें से कुछ संभवतः भंडारण के काम आते होंगे । मत्यु के बाद सामान्यतया मृतक के सगे संबंधी उसके प्रति सम्मान जताते हैं । लोगों स्था है कि मृत्यु के बाद भी जीवन होता है । इसीलिए कब्रों में मृतक के साथ कुछ सामान भी रखे जाते थे । मेहरगढ़ में


मेहरगढ़ के घर का चित्र । मेहरगढ़ के घर शायद ऐसे दिखते हों । तुम जिस घर में रहते हो उसके साथ इस घर को क्या समानता है ?


ऐसी कई कब्र मिली हैं । एक कब्र में एक मृतक के साथ एक बकरी को भी दफ़नाया गया था । संभवतः इसे परलोक में मृतक के खाने के लिए रखा गया होगा । मेहरगढ़ की कब्र का चित्र क्या तुम बकरी के कंकाल को पहचान सकते हो ?

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◆ फ्रांस में गुफा में की गई चित्रकारी 

 चित्र फ्रांस की एक गुफा का है । इस पुरास्थल की खोज लगभग 100 साल पहले चार स्कूली छात्रों ने की थी । इस तरह के चित्र लगभग 20,000 साल पहले से लेकर • 10,000 साल पहले के बीच बनाए गए होंगे । इनमें कई जानवरों के चित्र हैं । इनमें जंगली घोड़े , गाय , भैंस , गैंडा , रेनडीयर , बारहसिंघा और सूअरों को गहरे - चमकीले रंगों से चित्रित किया गया है । इन रंगों को लौह - अयस्क और चारकोल जैसे खनिज पदार्थों से बनाया जाता था । यह संभव है कि इन चित्रों को उत्सवों के अवसर पर बनाया जाता था या फिर इन्हें शिकारियों द्वारा शिकार पर निकलने से पहले कुछ अनुष्ठानों के लिए बनाया गया होगा ।

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