मुगल साम्राज्य!

मध्यकाल में किसी भी शासक के लिए भारतीय उपमहाद्वीप जैसे बड़े क्षेत्र पर , जहाँ लोगों एवं संस्कृतियों में इतनी अधिक विविधताएँ हो , शासन कर पाना अत्यंत ही कठिन कार्य था । अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत मुग़लों ने एक साम्राज्य की स्थापना की और वह कार्य पूरा किया , जो अब तक केवल छोटी अवधियों के लिए ही संभव जान पड़ता था । सोलहवीं सदी के उत्तरार्ध से , इन्होंने दिल्ली और आगरा से अपने राज्य का विस्तार शुरू किया और सत्रहवीं शताब्दी में लगभग संपूर्ण महाद्वीप पर अधिकार प्राप्त कर लिया । उन्होंने प्रशासन के ढाँचे तथा शासन संबंधी जो विचार लागू किए , वे उनके राज्य के पतन के बाद भी टिके रहे । यह एक ऐसी राजनैतिक धरोहर थी . जिसके प्रभाव से उपमहाद्वीप में उनके पश्चात् आने वाले शासक अपने को अछूता न रख सकें । आज भारत के प्रधानमंत्री , स्वतंत्रता दिवस पर मुग़ल शासकों के निवासस्थान , दिल्ली के लालकिले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हैं ।

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मुग़ल कौन थे?

मुगल कौन थे ? मुग़ल दो महान शासक वंशों के वंशज थे । माता की ओर से वे मंगोल शासक चंगेज़ खान जो चीन और मध्य एशिया के कुछ भागों पर राज करता था , के उत्तराधिकारी थे । पिता की ओर से वे ईरान , इराक एवं वर्तमान तुर्की के शासक तैमूर ( जिसकी मृत्यु 1404 में हुई ) के वंशज थे । परंतु मुग़ल अपने को मुग़ल या मंगोल कहलवाना पसंद नहीं करते थे । ऐसा इसलिए था , क्योंकि चरोज़ ख़ान से जुड़ी स्मृतियाँ सैंकड़ों व्यक्तियों के नरसंहार से संबंधित थीं । यही स्मृतियाँ मुग़लों के प्रतियोगियों उज़बेगों से भी संबंधित थीं । दूसरी तरफ़ , मुग़ल , तैमूर के वंशज होने पर गर्व का अनुभव करते थे , ज्यादा इसलिए क्योंकि उनके इस महान पूर्वज ने 1398 में दिल्ली पर कब्जा कर लिया था ।
मुगल कौन थे ? मुग़ल दो महान शासक वंशों के वंशज थे । माता की ओर से वे मंगोल शासक चंगेज़ खान जो चीन और मध्य एशिया के कुछ भागों पर राज करता था , के उत्तराधिकारी थे । पिता की ओर से वे ईरान , इराक एवं वर्तमान तुर्की के शासक तैमूर ( जिसकी मृत्यु 1404 में हुई ) के वंशज थे । परंतु मुग़ल अपने को मुग़ल या मंगोल कहलवाना पसंद नहीं करते थे । ऐसा इसलिए था , क्योंकि चरोज़ ख़ान से जुड़ी स्मृतियाँ सैंकड़ों व्यक्तियों के नरसंहार से संबंधित थीं । यही स्मृतियाँ मुग़लों के प्रतियोगियों उज़बेगों से भी संबंधित थीं । दूसरी तरफ़ , मुग़ल , तैमूर के वंशज होने पर गर्व का अनुभव करते थे , ज्यादा इसलिए क्योंकि उनके इस महान पूर्वज ने 1398 में दिल्ली पर कब्जा कर लिया था ।
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 मुगल सैन्य अभियान ?

प्रथम मुग़ल शासक बाबर ( 1526-1530 ) ने जब 1494 में फरघाना राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त किया , तो उसकी उम्र केवल बारह वर्ष की थी । मंगोलों की दूसरी शाखा , उज़बेगों के आक्रमण के कारण उसे अपनी पैतृक गद्दी छोड़नी पड़ी । अनेक वर्षों तक भटकने के बाद उसने 1504 में काबुल पर कब्जा कर लिया । उसने 1526 में दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराया और दिल्ली और आगरा को अपने कब्जे में कर लिया ।
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उत्तराधिकार की मुगल परंपराएं ?

मुग़ल ज्येष्ठाधिकार के नियम में विश्वास नहीं करते थे जिसमें ज्येष्ठ पुत्र अपने पिता के राज्य का उत्तराधिकारी होता था । इसके विपरीत , उत्तराधिकार में वे सहदायाद की मुग़ल और तैमूर वंशों की प्रथा को अपनाते थे जिसमें उत्तराधिकार का विभाजन समस्त पुत्रों में कर दिया जाता था । तालिका 1 में दिए गए रंगीन उद्धरणों को पढ़िए और मुग़ल राजकुमारों के विद्रोहों से जुड़े प्रमाणों पर गौर कीजिए । आपके अनुसार उत्तराधिकार का कौन - सा तरीका सही था - ज्येष्ठाधिकार या सहदायाद ? 

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मुग़लों के अन्य शासकों के साथ संबंध ?

 आप पाएँगे कि मुग़लों ने उन शासकों के विरुद्ध लगातार अभियान किए , जिन्होंने उनकी सत्ता को स्वीकार करने से इंकार कर दिया । जब मुग़ल शक्तिशाली हो गए तो अन्य कई शासकों ने स्वेच्छा से उनकी सत्ता स्वीकार कर ली । राजपूत इसका एक अच्छा उदाहरण हैं । अनेकों ने मुग़ल घराने में अपनी पुत्रियों के विवाह करके उच्च पद प्राप्त किए । परंतु कइयों ने विरोध भी किया ।
मेवाड़ के सिसोदिया राजपूत लंबे समय तक मुग़लों की सत्ता को स्वीकार करने से इंकार करते रहे , परंतु जब वे हारे तो मुग़लों ने उनके साथ सम्माननीय व्यवहार किया और उन्हें उनकी जागीरें ( वतन ) , वतन जागीर के रूप में वापिस कर दीं । पराजित करने परंतु अपमानित न करने के बीच सावधानी से बनाए गए संतुलन की वजह से मुग़ल भारत के अनेक शासकों और सरदारों पर अपना प्रभाव बढ़ा पाए । परंतु इस संतुलन को हमेशा बरकरार रखना कठिन था । एक बार फिर तालिका 1 देखें । गौर करें कि जब शिवाजी मुग़ल सत्ता स्वीकार करने आए तो औरंगजेब ने उनका अपमान किया । इस अपमान का क्या परिणाम हुआ ?

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मनसबदार और जागीरदार?

 जैसे - जैसे साम्राज्य में विभिन्न क्षेत्र सम्मिलित होते गए , वैसे - वैसे मुग़लों ने तरह - तरह के सामाजिक समूहों के सदस्यों को प्रशासन में नियुक्त करना आरंभ किया । शुरू - शुरू में ज्यादातर सरदार , तुर्की ( तूरानी ) थे , लेकिन अब इस छोटे समूह के साथ - साथ उन्होंने शासक वर्ग में ईरानियों , भारतीय मुसलमानों , अफ़गानों , राजपूतों , मराठों और अन्य समूहों को सम्मिलित किया । मुगलों की सेवा में आने वाले नौकरशाह ' मनसबदार ' कहलाए । ' मनसबदार ' शब्द का प्रयोग ऐसे व्यक्तियों के लिए होता था , जिन्हें कोई मनसब यानी कोई सरकारी हैसियत अथवा पद मिलता था । यह मुग़लों द्वारा चलाई गई श्रेणी व्यवस्था थी , जिसके जरिए ( 1 ) पद ; ( 2 ) वेतन ; एवं ( 3 ) सैन्य उत्तरदायित्व , निर्धारित किए जाते थे । पद और वेतन का निर्धारण जात की संख्या पर निर्भर था । जात की संख्या जितनी अधिक होती थी , दरबार में अभिजात की प्रतिष्ठा उतनी ही बढ़ जाती थी और उसका वेतन भी उतना ही अधिक होता था । जो सैन्य उत्तरदायित्व मनसबदारों को सौंपे जाते थे उन्हीं के अनुसार उन्हे घुड़सवार रखने पड़ते थे । मनसबदार अपने सवारों को निरीक्षण के लिए लाते थे । वे अपने सैनिको के घोड़ों को दगवाते थे एवं सैनिकों का पंजीकरण करवाते थे । इन कार्यवाहिये के बाद ही उन्हें सैनिकों को वेतन देने के लिए धन मिलता था । मनसबदार अपना वेतन राजस्व कत्रित करने वाली भूमि के रूप में पाते थे , जिन्हें जागीर कहते थे और जो तकरीबन ' इक़्ताओं के समान थीं । परंतु मनसबदार , मुक्तियों से भिन्न , अपने जागीरों पर नहीं रहते थे और न ही उन पर प्रशासन करते थे । उनके पास अपनी जागीरों से केवल राजस्व एकत्रित करने का अधिकार था । यह राजस्व उनके नौकर उनके लिए एकत्रित करते थे , जबकि वे स्वयं देश के किसी अन्य भाग में सेवारत रहते थे ।अकबर के शासनकाल में इन जागीरों का सावधानीपूर्वक आकलन किया जाता था , ताकि इनका राजस्व मनसबदार के वेतन के तकरीबन बराबर रहे । औरंगजेब के शासनकाल तक पहुँचते - पहुँचते स्थिति बदल गई । अब प्राप्त राजस्व , मनसबदार के वेतन से बहुत कम था । मनसबदारों की संख्या में भी अत्यधिक वृद्धि हुई , जिसके कारण उन्हें जागीर मिलने से पहले एक लंबा इंतजार करना पड़ता था । इन सभी कारणों से जागीरों की संख्या में कमी हो गई । फलस्वरूप कई जागीरदार , जागीर रहने पर यह कोशिश करते थे कि वे जितना राजस्व वसूल कर सकें , कर लें । अपने शासनकाल के अंतिम वर्षों में औरंगजेब इन परिवर्तनों पर नियंत्रण नहीं रख पाया । इस कारण किसानों को अत्यधिक मुसीबतों का सामना करना पड़ा ।

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