शासक और इमारते
कुतुबमीनार के पहले छज्जे को प्रदर्शित करता है । कुत्बउद्दीन ऐबक ने लगभग 1199 में इसका निर्माण करवाया था । छज्जे के नीचे छोटे मेहराब तथा ज्यामितीय रूपरेखाओं द्वारा निर्मित नमूने को देखें । क्या आपको छज्जे के नीचे अभिलेखों की दो पट्टियाँ दिखाई दे रही है । ये अभिलेख अरबी में हैं । गौर करें कि मीनार का बाहरी हिस्सा घुमावदार तथा कोणीय है । ऐसी सतह पर अभिलेख लिखने के लिए काफ़ी परिशुद्धता की आवश्यकता होती थी । सर्वाधिक योग्य कारीगर ही इस कार्य को संपन्न कर सकते थे । ) याद रखें कि आठ सौ वर्ष पूर्व केवल कुछ ही इमारतें पत्थर या ईंटों की बनी होती थीं । तेरहवीं शताब्दी में कुत्वमीनार जैसी इमारत का देखने वालों पर क्या प्रभाव पड़ा होगा ? आठवीं और अठारहवीं शताब्दियों के बीच राजाओं तथा उनके अधिकारियों ने दो तरह की इमारतों का निर्माण किया । पहली तरह की इमारतों में सुरक्षित ,संरक्षित तथा इस दुनिया और दूसरी दुनिया में आराम - विराम की भव्य जगहें - किले , महल तथा मकबरे थे । दूसरी श्रेणी में मंदिर , मसजिद , हौज़ , कुएँ , सराय तथा बाज़ार जैसी जनता के उपयोग की इमारतें थीं । राजाओं से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपनी प्रजा की देख - भाल करेंगे तथा प्रजा के उपयोग और आराम के लिए इमारतों का निर्माण करवाकर राजा उनकी प्रशंसा पाने की आशा करते थे । इस तरह के निर्माण कार्य , व्यापारियों सहित अन्य व्यक्तियों के द्वारा भी किए जाते थे । वे मंदिरों , मसजिदों और कुँओं का निर्माण करवाते थे । परंतु घरेलू स्थापत्य - व्यापारियों की विशाल हवेलियों के अवशेष अठारहवीं शताब्दी से ही मिलने शुरू होते हैं ।
(1) कुत्बमीनार पाँच मंज़िली इमारत है । अभिलेखों की पट्टियाँ इसके पहले छज्जे के नीचे हैं ।
(2) इस इमारत की पहली मंज़िल का निर्माण कुत्बउद्दीन ऐबक तथा शेष मंज़िलों का निर्माण 1229 के आस - पास इल्तुतमिश द्वारा करवाया गया )
(3) कई वर्षों में यह इमारत आँधी - तूफ़ान तथा भूकंप की वजह से क्षतिग्रस्त हो गई थी । अलाउद्दीन खलजी , मुहम्मद तुग़लक़ , फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ तथा इब्राहिम लोदी ने इसकी मरम्मत
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अभियांत्रिकी कौशल तथा निर्माण कार्य
स्मारकों से हमें उनके निर्माण में प्रयुक्त शिल्प विज्ञान का भी पता चलता है । छत का ही उदाहरण ले लीजिए । हम चार दीवारों के आर - पार लकड़ी की शहतीरों अथवा एक पत्थर की पटिया रखकर छत बना सकते हैं । लेकिन यह कार्य उस समय बहुत कठिन हो जाता है जब हम एक विस्तृत अधिरचना वाले विशाल कक्ष का निर्माण करना चाहते हैं । इसके लिए अधिक परिष्कृत कौशल की ज़रूरत होती है । सातवीं और दसवीं शताब्दी के मध्य वास्तुकार भवनों में और अधिक कमरे , दरवाजे और खिड़कियाँ बनाने लगे । छत , दरवाजे और खिड़कियाँ अभी भी दो ऊर्ध्वाधर खंभों के आर - पार एक अनुप्रस्थ शहतीर रखकर बनाए जाते थे । वास्तुकला की यह शैली ' अनुप्रस्थ टोडा निर्माण ' कहलाई जाती है । आठवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच मंदिरों , मसजिदों , मकबरों तथा सीढ़ीदार कुँओं ( बावली ) से जुड़े भवनों के निर्माण में इस शैली का प्रयोग हुआ ।
शिव की स्तुति में बनाए गए कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण चंदेल राजवंश के राजा धंगदेव द्वारा 999 में किया गया था । चित्र 3 ख मंदिर की योजना है । एक अलंकृत द्वार से इसके प्रवेश भाग और मुख्य सभा भवन ( महामंडप ) , जहाँ नृत्य का आयोजन होता था , तक पहुँचा जाता था । प्रमुख देवता की मूर्ति मुख्य मंदिर ( गर्भगृह ) में रखी जाती थी । धार्मिक अनुष्ठान इसी जगह संपन्न किए जाते थे तथा इसमें केवल राजा , उनका निकटतम परिवार तथा पुरोहित एकत्रित होते थे । खजुराहो समूह में राजकीय मंदिर सम्मिलित थे जहाँ सामान्य जनमानस को जाने की अनुमति नहीं थी । ये मंदिर सुपरिष्कृत उत्कीर्णित मूर्तियों से अलंकृत थे ।
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मंदिरों , मसजिदों और हौज़ों का निर्माण
मंदिरों और मसजिदों का निर्माण बहुत सुंदर तरीके से किया जाता था क्योंकि वे उपासना के स्थल थे । वे अपने संरक्षक की शक्ति , धन - वैभव तथा भक्ति भाव का भी प्रदर्शन करते थे । उदाहरण के लिए , राजराजेश्वर मंदिर को लिया जा सकता है । एक अभिलेख से इस बात का संकेत मिलता है कि इस मंदिर का निर्माण राजा राजदेव ने अपने देवता राजराजेश्वरम की उपासना हेतु किया था । ध्यान दें कि राजा और उसके देवता के नाम काफ़ी मिलते - जुलते हैं । राजा ने इस तरह का नाम इसलिए रखा , क्योंकि यह नाम मंगलकारी था और राजा स्वयं को ईश्वर के रूप में दिखाना चाहता था । धार्मिक अनुष्ठान के ज़रिए मंदिर में एक देवता ( राजा राजदेव ) , दूसरे देवता ( राजराजेश्वरम ) का सम्मान करता था । सभी विशालतम मंदिरों का निर्माण राजाओं ने करवाया था । मंदिर के अन्य लघु देवता शासक के सहयोगियों तथा अधीनस्थों के देवी - देवता थे । यह मंदिर शासक और उसके सहयोगियों द्वारा शासित विश्व का एक लघु रूप ही था । जिस तरह से वे राजकीय मंदिरों में इकट्ठे होकर अपने देवताओं की उपासना करते थे , ऐसा प्रतीत होता था मानो उन्होंने देवताओं के न्यायप्रिय शासन को पृथ्वी पर ला दिया हो । मुसलमान सुलतान तथा बादशाह स्वयं को भगवान के अवतार होने का दावा तो नहीं करते थे किंतु फ़ारसी दरबारी इतिहासों में सुलतान का वर्णन ' अल्लाह की परछाई ' के रूप में हुआ है । दिल्ली की एक मसजिद के अभिलेख से पता चलता है कि अल्लाह ने अलाउद्दीन को शासक इसलिए चुना था , क्योंकि उसमें अतीत के महान विधिकतर्ताओं भूसा और सुलेमान की विशिष्टताएँ मौजूद थीं । सबसे महान विधिकर्ता और वास्तुकार अल्लाह स्वयं था । उसने अव्यवस्था को दूर करके विश्व का सृजन किया तथा एक व्यवस्था और संतुलन कायम किया । सत्ता में आने पर प्रत्येक राजवंश के राजा ने शासक होने के अपने नैतिक अधिकार पर और ज़ोर डाला । उपासना के स्थानों के निर्माण ने शासकों को , ईश्वर के साथ अपने घनिष्ठ संबंध की उद्घोषणा करने का मौका दिया । ऐसी उद्घोषणाएँ तेज़ी से बदलती राजनीति के संदर्भ में महत्त्व ग्रहण कर लेती थीं । शासकों ने विद्वान तथा धर्मनिष्ठ व्यक्तियों को भी आश्रय प्रदान किया और अपनी राजधानियों तथा नगरों को महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक केंद्रों के रूप में परिवर्तित करने का प्रयास किया । इन सबसे उनके शासन तथा राज्य को ख्याति मिली । व्यापक समझ यह थी कि न्यायप्रिय राजा का राज ऐसा होगा , जहाँ खुशहाली होगी और जहाँ पर्याप्त वर्षा होगी । इसी तरह हौज़ों और जलाशयों के निर्माण द्वारा बहुमूल्य पानी उपलब्ध कराने के कार्य की बहुत प्रशंसा की जाती थी । सुलतान इल्तुतमिश ने देहली - ए - कुना के एकदम निकट एक विशाल तालाब का निर्माण करके व्यापक सम्मान प्राप्त किया । इस विशाल जलाशय को हौज़ - ए - सुल्तानी अथवा ' राजा का तालाब ' कहा जाता था । क्या आप इसे अध्याय 3 के मानचित्र 1 में ढूँढ सकते हैं ? शासक प्रायः सामान्य लोगों के लिए बड़े और छोटे हौजों और तालाबों का निर्माण करवाते थे । कभी - कभी वे किसी मंदिर , मसजिद अथवा गुरुद्वारे का हिस्सा होते थे ।
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मंदिरों को क्यों नष्ट किया गया ?
राजा , मंदिरों का निर्माण अपनी शक्ति , धन - संपदा और ईश्वर के प्रति निष्ठा के प्रदर्शन हेतु करते थे । ऐसे में यह बात आश्चर्यजनक नहीं लगती है कि जब उन्होंने एक दूसरे के राज्यों पर आक्रमण किया , तो उन्होंने प्रायः ऐसी इमारतों पर निशाना साधा । नवीं शताब्दी के आरंभ में जब पांड्यन राजा श्रीमा श्रीवल्लभ ने श्रीलका पर आक्रमण कर राजा सेन प्रथम ( 831-850 के पराजित किया था , उसके विषय में बौद्ध भिक्षु व इतिहासकार धम्मकित्ति = लिखा है कि , " सारी बहुमूल्य चीजें वह ले गया ... रत्न महल में रखी स्वर्ण की बनी बुद्ध की मूर्ति ... और विभिन्न मठों में रखी सोने की प्रतिमाओं - इन सभी को उसने जब्त कर लिया । " सिंहली शासक के आत्माभिमान को इससे ज आघात लगा था , उसका बदला लिया जाना स्वाभाविक था । अगले सिंहली शासक सेन द्वितीय ने अपने सेनापति को , पांड्यों की राजधानी मदुरई पर आक्रमण करने का आदेश दिया । बौद्ध इतिहासकार ने लिखा है कि इस अभियान में बुद्ध की स्वर्ण मूर्ति को ढूंढ निकालने तथा वापस लाने हेतु महत्त्वपूर्ण प्रयास किए गए । इसी तरह ग्यारहवीं शताब्दी के आरंभ में जब चोल राजा राजेंद्र प्रथम में अपनी राजधानी में शिव मंदिर का निर्माण करवाया था तो उसने पराजित शासकों से जब्त की गई उत्कृष्ट प्रतिमाओं से इसे भर दिया । एक अधूरी सूची में निम्न चीजें सम्मिलित थीं : चालुक्यों से प्राप्त एक सूर्य पीठिका , एक गणेश मूर्ति तथा दुर्गा की कई मूत्तियाँ , पूर्वी चालुक्यों से प्राप्त एक नंदी मूर्ति , उड़ीस के कलिंगों से प्राप्त भैरव ( शिव का एक रूप ) तथा भैरवी की एक प्रतिमा तथा बंगाल के पालों से प्राप्त काली की मूर्ति । गजनी का सुलतान महमूद राजेंद्र प्रथम का समकालीन था । भारत में अपने अभियानों के दौरान उसने पराजित राजाओं के मंदिरों को अपवित्र किया तथा उनके धन और मूर्तियों को लूट लिया । उस समय सुलतान महमूद कोई बहुत महत्त्वपूर्ण शासक नहीं था , लेकिन मंदिरों को नष्ट करके - खास तौर से सोमनाथ का मंदिर - उसने एक महान इस्लामी योद्धा के रूप में श्रेय प्राप्त करने का प्रयास किया । मध्ययुगीन राजनीतिक संस्कृति में ज्यादातर शासक अपने राजनैतिक बल व सैनिक सफलता का प्रदर्शन पराजित शासको के उपासना स्थलों पर आक्रमण करके और उन्हें लूट कर करते थे ।
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