क्या , कब , कहाँ और कैसे ?

● कैसे पता लगाएँ ?

 यह जानने के लिए कि कल क्या हुआ था , तुम रेडियो सुन सकते हो , टेलीविजन देख सकते हो या फिर अखबार पढ़ सकते हो । साथ ही यह जानने के लिए कि पिछले साल क्या हुआ था , तुम किसी ऐसे व्यक्ति से बात कर सकते हो जिसे उस समय की स्मृति हो । लेकिन बहुत पहले क्या हुआ था यह कैसे जाना जा सकता है ? 
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● अतीत के बारे में हम क्या जान सकते हैं ?

 अतीत के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है - जैसे लोग क्या खाते थे , कैसे कपड़े पहनते थे , किस तरह के घरों में रहते थे ? हम आखेटकों ( शिकारियों ) , पशुपालकों , कृषकों , शासकों , व्यापारियों , पुरोहितों , शिल्पकारों , कलाकारों , संगीतकारों या फिर वैज्ञानिकों के जीवन के बारे में जानकारियाँ हासिल कर सकते हैं । यही नहीं हम यह भी पता कर सकते हैं कि उस समय बच्चे कौन - से खेल खेलते थे , कौन - सी कहानियाँ सुना करते थे , कौन - से नाटक देखा करते थे या फिर कौन - कौन से गीत गाते थे ।
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● लोग कहाँ रहते थे ?  

कई लाख वर्ष पहले से लोग इस नदी के तट पर रह रहे हैं । यहाँ रहने वाले आरंभिक लोगों में से कुछ कुशल संग्राहक थे जो आस - पास के जंगलों की विशाल संपदा से परिचित थे । अपने भोजन के लिए वे जड़ों , फलों तथा जंगल के अन्य उत्पादों का यहीं से संग्रह किया करते थे । वे जानवरों का आखेट ( शिकार ) भी करते थे । इसी क्षेत्र में कुछ ऐसे स्थान हैं जहाँ लगभग आठ हजार वर्ष पूर्व स्त्री - पुरुष ने सबसे पहले गेहूँ तथा जौ जैसी फ़सलों को उपजाना आरंभ किया । उन्होंने भेड़ , बकरी और गाय - बैल जैसे पशुओं को पालतू बनाना शुरू किया । ये लोग गाँवों में रहते थे । ये कुछ अन्य ऐसे क्षेत्र थे जहाँ कृषि का विकास हुआ । जहाँ सबसे पहले चावल उपजाया गया वे स्थान विंध्य के उत्तर में स्थित थे । सहायक नदियाँ उन्हें कहते हैं जो एक बड़ी नदी में मिल जाती न हैं । लगभग 4700 वर्ष पूर्व इन्हीं नदियों के किनारे कुछ आरंभिक नगर फले - फूले । गंगा व इसकी सहायक नदियों के किनारे तथा समुद्र तटवर्ती इलाकों में नगरों का विकास लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुआ। गंगा के दक्षिण में इन नदियों के आस - पास का क्षेत्र प्राचीन काल में ' मगध ' ( वर्तमान बिहार में ) नाम से जाना जाता था । इसके शासक बहुत शक्तिशाली थे और उन्होंने एक विशाल राज्य स्थापित किया था । देश के अन्य हिस्सों में भी ऐसे राज्यों की स्थापना की गई थी । लोगों ने सदैव उपमहाद्वीप के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक यात्रा की । कभी - कभी हिमालय जैसे ऊँचे पर्वतों , पहाड़ियों , रेगिस्तान , नदियों तथा समुद्रों के कारण यात्रा जोखिम भरी होती थी , फिर भी ये यात्रा उनके लिए असंभव नहीं थीं । अत : कभी लोग काम की तलाश में तो कभी प्राकृतिक आपदाओं के कारण एक स्थान से दूसरे स्थान जाया करते थे । कभी - कभी सेनाएँ दूसरे क्षेत्रों पर विजय हासिल करने के लिए जाती थीं । इसके अतिरिक्त व्यापारी कभी काफ़िले में तो कभी जहाज़ों में अपने साथ मूल्यवान वस्तुएँ लेकर एक स्थान से दूसरे स्थान जाते रहते थे । धार्मिक गुरू लोगों को शिक्षा और सलाह देते हुए एक गाँव से दूसरे गाँव तथा एक कसबे से दूसरे कसबे जाया करते थे । कुछ लोग नए और रोचक स्थानों को खोजने की चाह में उत्सुकतावश भी यात्रा किया करते थे । इन सभी यात्राओं से लोगों को एक - दूसरे के विचारों को जानने का अवसर मिला ।
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◆ आज लोग यात्राएँ क्यों करते हैं ?

  पहाड़ियाँ , पर्वत और समुद्र इस उपमहाद्वीप की प्राकृतिक सीमा का निर्माण करते हैं । हालांकि लोगों के लिए इन सीमाओं को पार करना आसान नहीं था , जिन्होंने ऐसा चाहा वे ऐसा कर सके , वे पर्वतों की ऊँचाई को छू सके तथा गहरे समुद्रों को पार कर सके । उपमहाद्वीप के बाहर से भी कुछ लोग यहाँ आए और यहीं बस गए । लोगों के इस आवागमन ने हमारी सांस्कृतिक परंपराओं को समृद्ध 
किया । कई सौ वर्षों से लोग पत्थर को तराशने , संगीत रचने और यहाँ तक कि भोजन बनाने के नए तरीकों के बारे में एक - दूसरे के विचारों को अपनाते रहे हैं । 
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देश के नाम 

अपने देश के लिए हम प्राय : इण्डिया तथा भारत जैसे नामों का प्रयोग करते हैं । इण्डिया शब्द इण्डस से निकला है जिसे संस्कृत में सिंधु कहा जाता है । अपने एटलस मे ईरान और यूनान का पता लगाओ । लगभग 2500 वर्ष पूर्व उत्तर - पश्चिम की ओर से आने वाले ईरानियों और यूनानियों ने सिंधु को हिंदोस अथवा इंदोस और इस नदी के पूर्व में स्थित भूमि प्रदेश को इण्डिया कहा । भरत नाम का प्रयोग उत्तर - पश्चिम में रहने वाले लोगों के एक समूह के लिए किया जाता था । इस समूह का उल्लेख संस्कृत की आरंभिक ( लगभग 3500 वर्ष पुरानी ) कृति ऋग्वेद में भी मिलता है । बाद में इसका प्रयोग देश के लिए होने लगा । 

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ताड़पत्रों से बनी पाण्डुलिपि का एक पृष्ठ 

यह पाण्डुलिपि लगभग एक हजार वर्ष पहले लिखी गई थी । किताब के पत्तों को काटकर उनके अलग - अलग हिस्सों को एक साथ बाँध दिया जाता था । भूर्ज पेड़ की छाल से बनी ऐसी ही एक पाण्डुलिपि को तुम यहाँ देख सकते हो ।

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अतीत के बारे में कैसे जानें ?

 अतीत की जानकारी हम कई तरह से प्राप्त कर सकते हैं । इनमें से एक तरीका अतीत में लिखी गई पुस्तकों को ढूँढ़ना और पढ़ना है । ये पुस्तकें हाथ से लिखी होने के कारण पाण्डुलिपि कही जाती हैं । अंग्रेजी में ' पाण्डुलिपि ' के होने वाला ' मैन्यूस्क्रिप्ट ' शब्द लैटिन शब्द ' मेनू ' जिसका अर्थ हाथ है , से निकला है । ये पाण्डुलिपियाँ प्राय : ताड़पत्रों अथवा हिमालय क्षेत्र में उगने वाले भूर्ज नामक पेड़ की छाल से विशेष तरीके से तैयार भोजपत्र पर लिखी मिलती हैं ।इतने वर्षों में इनमें से कई पाण्डुलिपियों को कीड़ों ने खा लिया तथा कुछ नष्ट कर दी गई । फिर भी ऐसी कई पाण्डुलिपियाँ आज भी उपलब्ध हैं । प्रायः ये पाण्डुलिपियाँ मंदिरों और विहारों में प्राप्त होती हैं । इन पुस्तकों में धार्मिक मान्यताओं व व्यवहारों , राजाओं के जीवन , औषधियों तथा विज्ञान आदि सभी प्रकार के विषयों की चर्चा मिलती है । इनके अतिरिक्त हमारे यहाँ महाकाव्य , कविताएँ तथा नाटक भी हैं । इनमें से कई संस्कृत में लिखे हुए मिलते हैं जबकि अन्य प्राकृत और तमिल में हैं । प्राकृत भाषा का प्रयोग आम लोग करते थे । हम अभिलेखों का भी अध्ययन कर सकते हैं । ऐसे लेख पत्थर अथवा धातु जैसी अपेक्षाकृत कठोर सतहों पर उत्कीर्ण किए गए मिलते हैं । कभी - कभी शासक अथवा अन्य लोग अपने आदेशों को इस तरह उत्कीर्ण करवाते थे , ताकि लोग उन्हें देख सके , पढ़ सके तथा उनका पालन कर सके । कुछ अन्य प्रकार के अभिलेख भी मिलते हैं जिनमें राजाओं तथा रानियों सहित  अन्य स्त्री - पुरुषों ने भी अपने कार्यों के विवरण उत्कीर्ण करवाए हैं । उदाहरण के लिए  प्रायः शासक लड़ाइयों में  अर्जित विजयों का लेखा जोखा रखा करते थे ।  क्या तुम बता सकती हो कि कठोर सतह पर लेख लिखवाने के क्या लाभ थे ?  अतिरिक्त अन्य कई वस्तुएँ अतीत में बनीं और प्रयोग में लाई जाती थीं । ऐसी वस्तुओं का अध्ययन करने वाला व्यक्ति पुरातत्त्वविद् कहलाता है । पुरातत्त्वविद् पत्थर और इंट से बनी इमारतों के अवशेषों , चित्रों तथा मूर्तियों का अध्ययन करते हैं । वे औजारों , इथियारों , बर्तनों , आभूषणों तथा सिक्कों की प्राप्ति के लिए छान - बीन तथा खुदाई भी रते हैं । इनमें से कुछ वस्तुएँ पत्थर , पकी मिट्टी तथा कुछ धातु को बनी हो सकती हैं । ऐसे तत्त्व कठोर तथा जल्दी नष्ट न होने वाले होते हैं । पुरातत्त्वविद् जानवरों , चिड़ियों तथा मछलियों की हड्डियाँ भी ढूँढ़ते हैं । इससे उन्हें यह जानने में भी मदद मिलती है कि अतीत में लोग क्या खाते थे । वनस्पतियों के अवशेष बहुत मुश्किल से बच पाते हैं । यदि अन्न के दाने अथवा लकड़ी के टुकड़े जल जाते हैं तो वे जले हुए रूप में बचे रहते हैं ।
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लगभग 2250 वर्ष पुराना यह अभिलेख वर्तमान अफ़गानिस्तान के कंधार से प्राप्त हुआ है । यह अभिलेख अशोक नामक शासक के आदेश पर उत्कीर्ण करवाया गया था ।  जब हम कुछ लिखते हैं तब हम किसी लिपि का प्रयोग करते हैं । लिपियाँ अक्षरों अथवा संकेतों से बनी होती हैं । जब हम कुछ बोलते अथवा पढ़ते हैं तब हम एक भाषा का प्रयोग करते हैं । यह अभिलेख इस क्षेत्र में प्रयुक्त होने वाली यूनानी तथा अरामेइक नामक दो भिन्न लिपियों तथा भाषाओं में है ।
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◆ क्या पुरातत्त्वविदों को बहुधा कपड़ों के अवशेष मिलते होंगे ? 

पाण्डुलिपियों , अभिलेखों तथा पुरातत्त्व से ज्ञात जानकारियों के लिए इतिहासकार प्रायः स्रोत शब्द का प्रयोग करते हैं । इतिहासकार उन्हें कहते हैं जो अतीत का अध्ययन करते हैं । स्रोत के प्राप्त होते ही अतीत के बारे में पढ़ना बहुत रोचक हो जाता है , क्योंकि इन स्रोतों की सहायता से हम धीरे - धीरे अतीत का पुनर्निर्माण करते जाते हैं । अत : इतिहासकार तथा पुरातत्त्वविद् उन जासूसों की तरह हैं जो इन सभी स्रोतों का प्रयोग सुराग के रूप में कर अतीत को जानने का प्रयास करते हैं । 

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अतीत , एक या अनेक ?

 क्या तुमने इस पुस्तक के शीर्षक हमारे अतीत पर ध्यान दिया है ? यह ' अतीत ' शब्द का प्रयोग बहुवचन के रूप में किया गया है । ऐसा इस तथ्य की ओर ध्यान दिलाने के लिए किया गया है कि अलग अलग समान के लोगों के लिए इस अतीत के अलग अलग मायने या उदाहरण के पशुपालकों अथवा कृषकों का जीवन समाजातयाचिों के जाना से तथा व्यापारियों का जीवन शिल्पकारों के जोबन से चल चला । जैसाकि हम आज भी देखते हैं . उस समय भी देश के अत्ता मेला सो में लोग अलग - अलग व्यवहारों और रोति - रिवाजों का पालन करने की उदाहरण के लिए आज अंडमान द्वीप के अधिकाश लोग अपना पांचा मछलियाँ पकड़ कर , शिकार करके तथा फल - फूल के साहारा धान करते है । इसके विपरीत शहरों में रहने वाले लोग बाब आभूति के लिए अन्य व्यक्तियों पर निर्भर करते हैं । इस तरह के भेद अखोत में भी विद्यमान थे । इसके अतिरिक्त एक अन्य तरह का भेद है । उस समय सावक अपनी विजयों का लेखा - जोखा रखते थे । यही कारण है कि हम उन शासको तथा उनके द्वारा लड़ो जाने वालो लड़ाइयों के बारे में काफी कुछ जानते हैं । जबकि शिकारी , महुआरे . संग्राहक , कृषक अधना पशुपालक जैसे और आदमी प्रायः अपने कार्यों का लेखा - जोखा नहीं रखते थे । पुरताच की सहायता से हमें उनके जीवन को जानने में मदद मिलती है । हालाकि अभी भी इनके बारे में बहुत कुछ जानना शेष है । 
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तिथियों का मतलब ?


अगर कोई तुमसे तिधि के विषय में पूछे तो तुम शायद उस विष की तारीख , माह . वर्ष जैसे कि 2000 या इसी तरह का कोई और ना बताओगी । वर्ष की यह गणना ईसाई धर्म प्रवर्तक ईसा मसीह के जल को तिथि से की जाती है । अत : 200 वर्ष कहने का तात्पब सा गयी के जन्म के 2000 वर्ष के बाद से है । ईसा मसीह के जन्म के पूर्व सभा तिथिवा ई.पू. ( ईसा से पहले ) के तप में जानी जाती है । पुस्तक में हम 2000 को अपना आरोभक बिन्दु मानते हुए वर्तमान में - को तिथियों का उल्लेख करो । 

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